छवि ठाड़ी कर जोरे, रूप कला चौर ढोरैं
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 223 of 268
(कवित्त)
छवि ठाड़ी कर जोरे, रूप कला चौर ढोरैं,
दुति सेबैं तन गोरे रति बलि जात है। [1]
उजराई कुँज ऐन सुथराई रची सैन,
चतुराई चितै नैन अति ही लजात है॥ [2]
राग सुनि रागिनी हू होत अनुराग बस,
मृदुताई अंगनि छूवत सकुचात है। [3]
हितध्रुव सुकुमारी पूतरीन हूते प्यारी,
जब जब देखें बिहारी सुख बरसात है॥ [4]
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (39)
(कविता) छवी थदै कर जोरे, रूप काला चौर धरैं, दुती सेबैं तन गोरे राती बाली जात। [1] उजरै कुंज ऐं सुथरै रचि सैं, चतुरै चितै नैं अति शरमाई.. [2] अनुराग तो बस राग सुनता है, मृदुताई अंगाणी रह जाती है तंग। [3] हितध्रुव सुकुमारी की बेटी प्यारी है, जब देखो बिहारी सुख बरसता है... [4] - श्री ध्रुवदास जी, बयालिस लीला, शृंगार शत 1 (39)