वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 224 of 268
(कवित्त)
छुवत न रसिक रँगीलौ लाल प्यारी जूको,
मन हूके करनि सों छुवत डरत है। [1]
प्रेम की नौलासी प्यारी सहज ही सुकुमारी,
प्राणन की छाया तीन ऊपर करत है॥ [2]
नेंक ही के हास सखौ सार है बिलासन कौ,
जाके हैरे और सब सुख बिसरत है। [3]
अति ही आसक्त ताकी हितध्रुव यह गति,
रीझि रीझि दूर हीते पायन परत है॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (43)
(कविता) छूवत न रसिक रंगिलौ लाल प्यारी जुको, मन हुके करनी बेटा छूवत डरत है। [1] प्रेम की मासूम प्रियतमा स्वाभाविक रूप से सुंदर है, आत्मा की छाया ऊपर उठती है.. [2] सिर की मुस्कान ही सिर की सुंदरता है, बाल सारी खुशियाँ फैलाते हैं। [3].