वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 225 of 268

डीठि हू कौ भार जानि देखत न डीठ भरि, ऐसी सुकुमारी नैन-प्रान हूते प्यारी है। [1] माधुरी सहज कछु कहत न बनि आवै, नैकुही के चितवत चकित बिहारी है॥ [2] कौन भाँति मुख की अनूप काँति सरसाति, करत विचार तऊ जाति न बिचारी है। [3] 'हित ध्रुव’ मन परयौ रूप के भँवर माँझ, नेह बस भये सुधि देह की बिसारी है॥ [4] - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (47) मेरा दिल भरा हुआ है, मेरा दिल भारी नहीं है, इतनी खूबसूरत लड़की अपनी आँखों और आत्मा से बहुत प्यारी है। [1] माधुरी सहज सहज सहज कुछु कुछु न बानी आवै, नैकुहि मन से चकतर बिहारी.. [2] जिसे चेहरे की अनोखी चमक अच्छी लगती है, वे सोचते हैं, वह जात नहीं है, गरीब नहीं है। [3] प्रेम के भंवर में मन में 'हिट ध्रुव' है, तन का भय ही मन में आता है.. [4] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, शृंगार शत 1 (47)
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