ऐसैं हिय में बसत रहौ
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 23 of 268
ऐसैं हिय में बसत रहौ, नव-किसोर रस-रासि।
चितवनि अति अनुराग की, करत मंद मृदु हाँसि॥ [1]
करत मंद मृदु हाँसि दोउ, होत जु प्रेम प्रकास।
छके रहत मदमत्त गति, आनँद मदन विलास॥ [2]
'हित ध्रुव' छबि सौं कुंज में, दै अंसनि-भुज वैसे।
मेरी मति इति नाहिं, कहौं उपमा दै ऐसे॥ [3]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलिया (11)
अइसन आई मन बसत रहो, नवा-किशोर रस-रसी। अति प्रेम की चेतावनी, धीरे से हँसो। [1] धीरे से हंसो, तुम प्यार की रोशनी बन जाओ। मादक गति, आनंदमय आनंद, विलासिता... [2] 'हिट ध्रुव' सैकड़ों पार्कों में दिखाई देता है। मेरा अर्थ पर्याप्त नहीं है, क्या मैं उपमा इस प्रकार कह सकता हूँ.. [3] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, भजन कुण्डलिया (11)