वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 237 of 268
(कवित्त)
नवल नवेली अलबेली सुकुमारी जू कौ,
रूप पिय-प्राननिं कौ सहज अहार री। [1]
बिंजन सुभाइनि के नेह घृत सौं जु बने,
रोचक रुचिर हैं अनूप अति चारु री॥ [2]
नैननिं की रसना तृपित न होती क्यौंहूँ,
नई-नई रूचि 'ध्रुव' बढ़ति अपार री। [3]
पानिप कौ पानी प्याइ पान मुसिक्यान ख्वाइ,
राखे उर सेज स्वाइ पायौ सुख सार री॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (50)
(कविता) नवजात और सुसंस्कृत सुंदरियां कौन हैं, जो सुंदरता से प्यार करती हैं और खाने में आसान हैं? [1] बिंजन सुभैनी के प्रेम की मधुर सुगंध बनी, रुचि में अनूप अति मनमोहक है.. [2] नानिन की लगन क्यों न तृप्त हुई, 'ध्रुव की रुचि बढ़ती जा रही है। [3].