वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 25 of 268
(कवित्त)
नवल रँगीले दोऊ रस में रसीले अति,
सहज सुरंग नये नेह अनुरागे हैं। [1]
देखि-देखि प्यारी अनदेखी सी लगत मन,
निमिषौ न लागे नैन रैन सब जागे हैं॥ [2]
चाह भूली चाहि-चाहि यद्यपि लड़ैती पाहि,
ऐसै प्रेम रंग रस मोद मद पागे हैं। [3]
तेहि सुख की निकाई 'ध्रुव' पै कही न जाई,
तृपितौ न आई उर उरजनि लागे हैं॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (12)
(कविता) नया प्यार नये रंगे जोड़े के रस में एक बहुत ही रसीली, चिकनी सुरंग है। [1] देखि-देखि प्रिय अनादेखि सी लगत मन, निमिषौ न लागे नैन रैन सब जगा है.. [2] इच्छाएं, कामनाएं और अभिलाषाएं, संघर्ष के बावजूद, ऐसे प्रेम, रंग और रुचि के पन्ने हैं। [3] 'ध्रुव' शरीर में सुख की कोई विजय नहीं है, शरीर में सुख में कोई विजय नहीं है, शरीर में सुख में कोई विजय नहीं है। [4] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, शृंगार शत 3 (12)