वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 250 of 268

(कवित्त) सहज सुभाव पर्यौ नवल किशोरी जू कौ, मृदुता, दयालुता, कृपालुता की रासि हैं। [1] नैकहूं न रिस कहूं भूले हू न होत सखि, रहत प्रसन्न सदा हियेमुख हासि हैं॥ [2] ऐसी सुकुमारी प्‍यारे लाल जू की प्रान प्‍यारी, धन्‍य, धन्‍य, धन्‍य तेई जिनके उपासिहैं। [3] हित ध्रुव ओर सुख जहां लगि देखियतु, सुनियतु जहां लागि सबै दुख पासि हैं॥ [4] - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत (3.45) (कविता) सहज सुभाव पर्यौ नवल किशोरी जू कौ कोमलता, दया और दयालुता की रासी है। [1] न मैं क्रोध करता हूं, न भूलता हूं, सखी, मैं सदा सुखी और हर्षित हूं.. [2] ऐसी प्यारी लाल जू का जीवन मधुर है, धन्य है, धन्य है, धन्य है, जिसके गुणगान से मैं बंधा हुआ हूं। [3] ध्रुव या सुख जहां मिले वहां मारो, सुनियातु जहां सब दुख कट जाते हैं.. [4] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, शृंगार शत (3.45)
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