वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 257 of 268

ठौर-ठौर पिय रचत हैं, आसन कुसुम रसाल। को जानैं कहाँ बैठीहैं, अलबेली नव बाल॥ - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (74) सृष्टि भी मधुर है, पुष्पों की सुगंध भी मधुर है। कहाँ बैठी है जनैन, मासूम नवजात शिशु.. - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, प्रेमावली (74)
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