वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 260 of 268

वृन्दावन दुतिपत्र की, उपमा कौं कछु नाहिं। कोटि-कोटि बैकुंठ हूँ, तिहि सम कहे न जाहिं॥ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (13) वृन्दावन दूत जैसा कुछ नहीं है। लाखों वैकुण्ठ हैं, मैं उसी स्तर पर क्यों नहीं जा सकता? - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (13)
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