वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 262 of 268
वृन्दावन कौ जस अमल, जेहि पुराण में नाहिं।
ताकी बानी परौ जिनि, कबहुँ श्रवनन माहिं॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला,वृन्दावन शत लीला (84)
वृन्दावन की प्रथाएँ पुराने मन की नहीं हैं। सो वह बानी परौ जिनि, कब न होय श्रावण माही.. - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, वृन्दावन शत लीला (84)