वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 263 of 268

वृंदावन की लता सम, कोटि कलप तरु नाहिं। रज की तुल बैकुंठ नहिं, और लोक किहिं माहिं॥ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (41) लाखों वर्ष पुराना वृन्दावन की लता जितना पुराना कोई वृक्ष नहीं है। राज्य की तुलना में कोई वैकुण्ठ नहीं है, और संसार की तुलना में कुछ भी नहीं है.. - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, वृन्दावन शत लीला (41)
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