वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 3 of 268
चरन सरन हरिवंश की, जब लगि आयौ नाहिं।
नव निकुंज निजु माधुरी, क्यों परसै मन माहिं॥
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (2)
जब मन हुआ तो हरिवंश से रहा नहीं गया. नव निकुंज निजु माधुरी, क्यों परसाई मन माहि.. - श्री ध्रुवदास जी, बयालिस लीला, वृन्दावन शत लीला (2)