वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 32 of 268
(कुंडलियाँ)
वृंदाविपिन निमित्त गहि, तिथि बिधि मानैं आन।
भजन तहाँ कैसे रहै, खोयौ अपनै पान॥ [1]
खोयौ अपनै पान, मूढ़ कछु समुझत नाहीं।
चंद्रमनिहिं लै गुहै, काँच के मनियनि माहीं॥ [2]
जमुना-पुलिन निकुंज-घन, अद्भुत है सुख कौ सदन।
खेलत लाड़िली-लाल जहँ, ऐसौ है वृंदाविपिन॥ [3]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलियां (17)
(राशिफल) वृंदाविपिन निमित गहि, तिथि बिधि मनैन अन। स्तोत्र तुम वहां कैसे रहोगे, तुम अपने आप को खो देते हो... [1] तुम अपने आप को खो देते हो, तुम मूर्ख कुछ भी नहीं समझ पाओगे। चंद्रमनिहिं लै कैवहै, कांच के मनियानि माहिं..[2] जमुना-पुलिन निकुंज-घन, सुख घर अद्भुत। खेलत लड़ैली-लाल जहां, अइसौ है वृंदाविपिन.. [3] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, भजन कुंडलियां (17)