वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 34 of 268
हित सौं त्रिविध समीर बहै, जैसी रुचि जिहिं काल।
मधुर-मधुर कल कोकिला, कूजत मोर मराल॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृदावन शत लीला (18)
हित सौं त्रिविध समीर बहाई, जैसी रुचि जिहिन कल। मधुरा-मधुर काल कोकिला, कुजात मोर मराल.. - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, वृदावन शत लीला (18)