वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 35 of 268
ह्वै अनन्य इक-रस गहै, वृंदावन रस-रीति।
विधि-निषेध मानै न कछु, करै भजन सौं प्रीति॥
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलियां (18)
और कहाँ है इका-रस, वृन्दावन रस-रीति। मैं किसी निषेध से सहमत नहीं, बड़े प्रेम से भजन करता हूं.. - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, भजन कुंडलियां (18)