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Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 45 of 268

(कवित्त) कुंजनि के आँगन में जहाँ-जहाँ पग धरैं, छबि के बिछौना से बिछाये तहाँ जात है। [1] रंगभरी लाडिली निपट अलबेली भाँति, अलबेले लोइन न कैंहूँ ठहरात हैं॥ [2] नई-नई माधुरी कौ सार है शुभाइनि में , मुसकनि मानौं सुख-फूल बिगसात हैं। [3] सोंधे की सी बास 'ध्रुव' फैलि रही पाहिलैं ही, रूपनिधि पानिप के पुंज बरसात हैं॥ [4] - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (21) (कविता) कुंजणी के आंगन में जहां भी कदम रखता हूं, खुद को छवियों की शय्या पर लेटा हुआ पाता हूं। [1] रंग-बिरंगी लड़कियाँ लापरवाही से व्यवहार करती हैं, जहाँ लंगोटी लापरवाही से फैलाई जाती है.. [2] नव-माधुरी मेरी मस्तक है, शुभैनी मेरी मस्तक है, हृदय आनंद से भरा हुआ है। [3] 'ध्रुव' सोंधे बस की तरह फैल रहा है, ओह रे रूपनिधि, पानीप के गुच्छ बरस रहे हैं.. [4] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, श्रृंगार शत 1 (21)
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