वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 46 of 268
(कवित्त)
अलबेली चितवनि मुसिकनि अलबेली,
अलबेली चलनि ललन मन हरयौ है। [1]
वृंदावन-मही सब भई छबिमई आली,
पग-पग पर मानौं रूप झरि परयौ है॥ [2]
कनक बरन भये पत्र-फूल द्रुमनि के,
आभा तन रही छाइ कुंदन सो ढरयौ है। [3]
'हित ध्रुव' ऐसी भाँति झलकति तन काँति,
चितवत पिय चित नैकहुँ न टरयौ है॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (22)
(कविता) अलबेली चितावनि मुसिकानी अलबेली, अलबेली चलनी लालन मन हरयौ है। [1] वृन्दावन-माही सब भाई, छवि में आये, चरणों में रूप बहे। [2] कनक द्रुमणी का निर्भय पात्र-पुष्प है, उसकी आभा दीप्तिमान है, वह छह कुन्दन धारण किये हुए है। [3] 'हिट ध्रुव' बदन चमके ऐसे, चितवत पिया चित नैकाहुं न तारयौ है.. [4] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, शृंगार शत 1 (22)