वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 63 of 268
गौर-स्याम तन मन रँगे, प्रेम स्वाद रस सार।
निकसत नहिं तिहिं ऐन ते, अटके सरस बिहार॥
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (29)
गौरा-स्याम, तन-मन रंगों से भरा, प्रेम से भरा। इसका कोई अंत नहीं, ये सरस बिहार है.. - श्री ध्रुवदास जी, बयालिस लीला, वृन्दावन शत लीला (29)