वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 64 of 268

(कवित्त) छिन छिन नई छबि पानिप रही है फबि, राधिका-वल्लभ पर प्रान वारि डारियै। [1] अंगनि झलक अरु भूषन झमक आली, देखत रँगीली भाँति पलकें न टारियै॥ [2] रँग भींनी करैं बात बीच-बीच मुसिकात, चाहनि चपल चितै मोहीं सखी सारियै। [3] प्रेम की अनूप गति भूली तहाँ ध्रुव-मति, तन मन धन बुद्धि सबै बात हारियै॥ [4] - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (30) (कविता) राधिका-वल्लभ की जीवनदायिनी फैबी, जल बनकर बह रही है। [1] अंगनी झलक और भूषण झमक अली, पलकें नहीं झपकतीं जैसे देहात में.. [2] रंग कहते हैं लेकिन बीच में संगीत है, चहनि चपल चितै मोहिं सखी सरियै। [3] प्रेम की अतुलनीय गति भूल गई, ध्रुव-मति, तन, मन, धन, बुद्धि सब हरे.. [4] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, शृंगार शत 2 (30)
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