वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 65 of 268

हेम कौ सुमेर दान, रतन अनेक दान, गज दान, अन्नदान, भूमि दान करहिं। [1] मोतिनु के तुलादान, मकर प्रयाग-न्हान, ग्रहन में कासी दान, चित्त सुद्ध धरहीं॥ [2] सेजदान, कन्या दान, कुरुक्षेत्र गऊ दान, इतने में पापनिं कौं नेकहूँ न हरहीं। [3] कृष्ण केसरी कौ नाम, एक बार लीन्हें 'ध्रुव', पापी तिहुँ लोकनि के छिन माँहि तरहीं॥ [4] - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, जीव दशा (30) वह हमसे धन दान, अनेक रत्न दान, गज दान, अन्न दान, भूमि दान कराता है। [1] मोतिनु का तुला दान, मकर प्रयाग-नहन, ग्रहण के दौरान काशी दान, मन को शुद्ध रखें.. [2] साधु दान, कन्या दान, कुरूक्षेत्र गौ दान, इतने मन से पाप किसने किया? [3] कृष्ण केसरी का नाम क्या है, जिन्हें कभी 'ध्रुव' कहा जाता था, पापी वही है जो तीनों लोक छीन लेता है.. [4] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, जीव दशा (30)
वृन्दाविपिन प्रणाम करिपरम रसिक नागर नवल, और न कछू सुहात।