हौं निज सखियनि की बलिहारी

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 67 of 268

(राग सारंग) सोभित आज छबीली जोरी। सुंदर नवल रसिक मन मोहन, अलबेली नव वैस किसोरी॥ [1] बेसरि उभय हँसनि में डोलत, सो छवि लेत प्रान चित चोरी। 'हित ध्रुव' फँदी मीन ये अखियाँ, निरखत रूप प्रेम की डोरी॥ [2] - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (30) (राग सारंगा) शोभित अज छबीली जोरी। ख़ूबसूरत, रोमांटिक, रोमांटिक सोच वाली, अल्हड़, उस लड़की की तरह.. [1] हंसी में बेर उभय डोलत, तो छवि को पूरे दिल से ले लो। 'हित ध्रुव' फांदी मिन ये अखियां, निरखत रूप प्रेम की डोरी.. [2] - श्री हित ध्रुव दास, बयालिस लीला, पद्यावली (30)
परम रसिक नागर नवल, और न कछू सुहात।वृन्दाविपिन प्रणाम करि