वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 7 of 268

यह आसा धरि चित्त में, कहत जथा मति मोर। वृन्दावन सुख रंग कौ, काहू न पायौ ओर॥ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (04) ऐसी सोच वाला ये शख्स कहता है, 'जथा माटी मोर'. वृन्दावन में सुख का रंग क्या है, मैं उससे क्यों न प्रेम करूँ.. - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (04)
भाँति रँगीली छबीली के संग, छबीलौ बन्यौ छबि की निधि माई। [1]वृन्दाविपिन प्रणाम करि