वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 8 of 268

अब लगि मन कीन्हौ सोई , जो जो कह्यौ तैं मोहि। अब तू मेरौ कह्यौ करि, जुगल चरन छवि जोहि॥ - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (5) अब मुझे सोने का मन कर रहा है, तुम कुछ भी कहो, तुम मेरे आशिक हो। अब आप ही कुछ कहें, जुगल चरण छवि जोही.. - श्री ध्रुवदास जी, बयालिस लीला, मन शिक्षा लीला (5)
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