वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 85 of 268
रूप-रसीली हँसीली छबीली रँगीली,
रँगीले के प्रान ते प्यारी। [1]
सुलज्ज सुरंग सुनैन बिसालनि,
सोभित अंजन रेख अनियारी॥ [2]
महामृदु बोलनि मोती की डोलनि,
मोल लिये ध्रुव कुंज-बिहारी। [3]
रहे सुख पाइ न और सुहाइ,
भये बस नेह के देह बिसारी॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत, प्रथम श्रृंखला (36)
रूपा - स्वादिष्ट, आनंददायक और रंगीन, एक रंगीन व्यक्ति की आत्मा को सबसे प्रिय। [1] सुलज्ज सुरंग सुनैन बिसलानी, सोभित अंजन रेख अनियारी.. [2] महमृदु बोलनी मोती की डोलनी, मोल लिए ध्रुव कुंजा-बिहारी। [3] न दुःख हो, न सुख में सुख हो, बस प्रेम का तन मिट जाये.. [4] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, श्रृंगार शत, प्रथम शृंखला (36)