प्रीतम के प्रान प्यारी
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 88 of 268
(राग ईमन)
प्रीतम के प्रान प्यारी, प्यारी जी के प्रान पिय।
प्रेम रासि एक रस, दोऊ छवि देखहीं॥
तृपित न होत क्यौं हूँ, बढ़त अधिक रुचि,
छिन-छिन चौंप नई लागै नैन न निमेषहीं॥ [1]
रीझि-रीझि रंग-भरे उमगि लोइन ढरे,
अंक-अंक रहे भरि विवस विसेषहीं॥
‘हित ध्रुव’ यह गति हेरि कैं मगन भईं,
सखी सब ऐसैं रही मानौ चित्र रेख हीं॥ [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (37)
(राग ईमान) प्रियतम, प्रियतम का प्राण पियो। प्रेम एक रस है, दो छवि देखी है.. क्यों नहीं तृप्त है, रस अधिक है, छीन-झपट कर, न नैन न दृष्टि.. [1] रीझी-रीझी, भरी कमर रंग, बात-बात में भारी विश्वास.. 'मारो ध्रुव', केश की यही गति है सुखी भाई, सभी मित्र सुखी नहीं, मैं चित्र देख रहा हूं.. [2] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, पद्यावली (37)