वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 90 of 268

सोने ते सुरंग गोरी सौंधे सौं सुवास अति, मृदुताई पर वारौं जेतिक सुमन री। [1] रूप ही कौ रूप जगमगत सकल बन, आरसी कौं आरसी लसत ऐसौ तन री॥ [2] फैलि रही छबि-प्रभा जहाँ लौं बिराजै सभा, 'हित ध्रुव' चितै लाल भये है मगन री। [3] प्राननिं के प्रान और नैंननिं के नैन मेरे, रीझि-रीझि बार-बार कहै छवै चरन री॥ [4] - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (37) सुनहरी सुरंग से एक सुगंध आ रही थी, सुगंध बहुत मधुर थी, कोमल सतह पर हवा भी मधुर थी। [1] जो जगत का रूप है, जगत स्थूल है, इस शरीर के समान जीवन दीर्घ है.. [2] मैं जहां भी बैठूं, प्रकाश फैल रहा है, 'हित ध्रुव' चितई लाल भये। [3] जीव के प्राण और नयन के नयन मेरे, रीझी-रीझी बारंबार कहवै छ्वै चरण री.. [4] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, शृंगार शत 1 (37)
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