वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 96 of 268
(कवित्त)
नवल रसिक पिय एक मन एक हीय,
एकै बात है सुहाती दुहुँनी के मन कौ। [1]
एक वैस एक जोर एक से भूषण पट,
एक सी छबीली छबी राजति है तन कौं॥ [2]
रूप ही के रंग भीने लोचन चकोर किन्हें,
एकै संग चाहैं ऐसैं जैसे मीन वन कौं। [3]
'हित ध्रुव' रसिक सीरोमनि जुगल बिनु,
आली को निवाहै एक रस प्रेम पन कौं॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला,श्रृंगार शत 2 (40)
(कविता) नवल रसिक पिया, एक ही मन है, एक ही बात है, जो सुहाति दुहानी के मन में है। [1] जिसका शरीर एक जैसा है, एक जैसे आभूषण हैं, एक जैसी सुंदर छवि है... [2] जिसका एक जैसा रंग है, एक जैसा सौंदर्य है, जो मेरे जैसा नहीं है। [3] 'हित ध्रुव' रसिक सिरोमनि जुगल बिनु, अली को निवाहय एक रस प्रेम पान कौन.. [4] - श्री ध्रुव दास, बयालिस लीला, श्रृंगार शत 2 (40)