चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 118 of 135
मोह-फाँस जग बँधि रह्यौ, बिष्ठुरे करत बिलाप॥
बिछुरे करत बिलाप, मानि सुत, पितु, पति, माता ।
ससुर, जमाई, जुबति, सुहृद, गुरु, सिष, धन, भ्राता
निज अनुभव की भूल, बिभव भगवत बिरमाये ।
को हम, कहँ को जात, कहाँ ते, किहि लगि आये॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (34)
संसार को मोह के जाल में बाँधे रखो, बिच्छू कराह रहे हैं... बिच्छू कराह रहे हैं, मणि सो रही है, पिता, पति, माता। ससुर, दामाद, साली, जीजा, गुरु, शिष्य, पैसा, भाई, आपके अनुभव की गलती, भगवान आपकी आत्मा को शांति दे। को हम, कहाँ को जात, कहाँ ते, किही लागी ऐ.. - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चातम पुस्तक - द्वितीय भाग (34)