चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 119 of 135

मेरे प्रान धन स्वामिनि स्याम राधे। [1] एक रस रूप सम वैस बारिज बदन छके रहें प्रेम यह नेम साधे॥ [2] करत केलि बिपरीत परस्पर विछुर नहिं जात कहुं पलक आधे। [3] नैन की सैंन बरबैन भगवत रसिक देत सुख लेत सहचरि अगाधे॥ [4] - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (2.7) श्याम राधे मेरे प्राण धन स्वामिनी। [1] प्यार एक ही रूप में रहता है, एक ही रूप में रहता है, इस नाम से शरीर अछूता रहता है.. [2] सिर्फ आँखें खोलने से हम एक दूसरे से अलग नहीं होते। [3] नेत्रों के संबरबैन, भगवत रसिक सुख देते हैं, रसातल में साथ ले जाते हैं.. [4] - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (2.7)
चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहिनैननि देखीं और नहीं, श्रवण सुने नहीं और ।