सब ऐश्वर्य छिपाइ पाइँ परि
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 129 of 135
(राग भैरव)
सब ऐश्वर्य छिपाइ पाइँ परि दीन भयौ अभिमानी।
प्रगट कियौ माधुर्य मधुररस रसिक - नरेस निसानी॥ [1]
नेति नेति निगमामग गावत, पावत नहीं बुधि-बानी।
भगवत रसिक रसिक सखियन सँग, अंखियाँ निरखि सिरानी॥ [2]
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.20.10)
(राग भैरव) सारा ऐश्वर्य छिपा है, दुःख देवदूत के दिन का है, भय अहंकार का है। रसिक के मधुर मधुर रस को प्रकट किया - नरेस निसानी.. [1] नेति नेति निगममग गावत, पावत नहीं बुद्धि-बानी। भागवत रसिक रसिक सखियां संग, अंखियां निरखि सिराणी.. [2] - श्री भागवत रसिक, श्री भागवत रसिक की वाणी, अनन्यारसिकभरण ग्रंथ (1.20.10)