कुंज महल रंग हो हो होरी
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 128 of 135
(राग गौरी)
रसभरे राजत रसिकबहारी ।
गौर स्याम अभिराम रूप दोऊ नव नेह विहारी ।
यह सुख निरखि सखी नित प्रमुदित, प्रान करै बलिहारी ।
भगवतरसिक पियत या रस को और लगै सब खारी॥
- श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (6.6)
(राग गौरी) रसभरे रजत रसिकबहारी। गौर स्याम अभिराम रूप दोउ नव नेह विहारी। यह सुख-मुक्त सखी सदैव प्रसन्न रहती है और अपना जीवन न्यौछावर कर देती है। भगवत रसिक ने पी लिया या सब कुछ नमकीन कर दिया.. - श्री भागवत रसिक - भागवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (6.6)