नित ही प्रति देखि-देखि गुन गाऊँ

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 14 of 135

नित ही प्रति देखि-देखि गुन गाऊँ। अति उदार, सुकुमार, मनोहर, जुगल किशोर लड़ाऊँ॥ [1] अंग-अंग रस रंग माधुरी, पीवन जीव जीवाऊँ। भगवत रसिक रसीली बातें, कहत सुनत सुख पाऊँ॥ [2] - श्री भगवत रसिक जी, अनन्य रसिकाभरण ग्रन्थ (10.5) हर दिन, हर दिन मैं देखता हूं, देखता हूं और सुनता हूं। अति उदार, नाज़ुक, मनमोहक, जुगल किशोर लाडौन। [1] अंग-अंग रस, रंग माधुर्य, मधुर जीवन। भागवत रसिक कहते हैं रोचक बातें, कहते हैं सुनत सुख पौन.. [2] - श्री भागवत रसिक जी, अन्य रसिकभरण ग्रंथ (10.5)
कोउ सुकिया कोउ परकियातुब मुख नैन कमल अली मेरे