कोउ सुकिया कोउ परकिया

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 13 of 135

कोउ सुकिया, कोउ परकिया, कलपि किये मत बादि। जोरी भगवतरसिक की, नित्य अनंत अनादि॥ [1] नित्य अनंत अनादि, लोक ते रीति विलक्षन। स्तृति-असतृती बिलगाइ, देखि अनुभव के अक्षम॥ [2] सहज प्रेम माधुर्य रहत अनुरागे दोउ। ललिता सखी प्रसार, बिना तहॅ जात न कोउ॥ [3] - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (5) कोऊ सुकिया, कोउ परकिया, कालापी किए मत पलटो। भगवतारसिक शक्ति नित्य अनंत अनादि.. [1] नित्य अनंत अनादि, संसार की रीति से भिन्न। स्त्री - अप्राप्य, देखने में असमर्थ। ललिता सखी प्रसार, बिना ताहे जात न कोउ.. [3] - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनोरंजन (5)
चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहिनित ही प्रति देखि-देखि गुन गाऊँ