कोउ सुकिया कोउ परकिया
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 16 of 135
(कुंडलियाँ)
नाहीं द्वैताद्वैत हरि, नहीं बिसिष्टाद्वैत।
बँधे नहीं मतवाद में, ईश्वर इच्छाद्वैत॥ [1]
ईश्वर इच्छाद्वैत, करै सब ही की पोषन।
आप रहैं निर्लेप, भक्त सौं मानै तोषन॥ [2]
भगवत रसिक अनन्य, संग डोलै गलबॉँहीं।
करै मनोरथ सिद्ध उचित अनुचित कछु नाँहीं॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (6)
(राशिफल) न द्वैत हरि, न द्वैत हरि। मनुष्य हठधर्मिता से बंधा नहीं है, भगवान इच्छाद्वैत है.. [1] भगवान इच्छाद्वैत, सभी का पोषण करते हैं। तुम भोले रहो, भक्त मस्त रहे..[2] भगवान का प्रेमी आया है, मैं अपना प्रेम तुमसे बाँटूँगा। आपकी इच्छा पूरी होने में कुछ भी सही या गलत नहीं है। [3] - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनोरंजन (6)