नहिं निर्गुन सर्गुन नहीं

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 17 of 135

रजधानी वृंदाविपिन, बय किसोर जुगराज। करैं सहचरी नित नए, काम केलि के साज॥ - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (6) राजधानी वृंदाविपिन, बे किशोर जुगराज। दिन रात संगति करुंगा, काम का साधन.. - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (6)
कोउ सुकिया कोउ परकियानहिं निर्गुन सर्गुन नहीं