वन्दत प्रिया पाद जल जात

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 19 of 135

(राग सोरठ) वन्दत प्रिया पाद जल जात। कामरस वश श्यामसुन्दर धरि हृदय जल जात॥ [1] करत अति आधीनता परसत दृगन जल जात। रसिक भगवत चूमितल मंजुल सुमुख जल जात॥ [2] - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 7 (6) (राग सोरठा) वंदत प्रिया पद जल जात। हवस से खूबसूरत दिल जल जाते हैं. [1] अत्यधिक समर्पण के कारण सभी सात ड्रेगन जला दिए गए। रसिक भागवत चूमितल मंजुल सुमुख जल जात.. [2] - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 7 (6)
नहिं निर्गुन सर्गुन नहींबेगम अगम निगम कहैं