नहिं निर्गुन सर्गुन नहीं
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 18 of 135
रजधानी वृन्दाबिपिन, वय किसोर जुगराज।
करै सहचरी नित नये, कामकेलि के साज॥
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (6)
पूंजी वृन्दाबिपिन, वह किशोर जुगराज। साथी को दिन-दिन नया बनायें, कामकेलि का साधन.. - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (6)