चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 2 of 135

गावै हम सोई करै, सहज लाडिली लाल। करै लाडिली-लाल सो, हम गावै तत्काल॥ [1] हम गावै तत्काल, सूत दुहुँ दिसि कौ ऐसी। बुध जन लेहु बिचारि, कमल दिनकर कौ जैसौ॥ [2] लीला ललित बिहार, स्याम स्यामा मन भावै। भगवतरसिक अननन्य, उपासक अनुदिन गावै॥ [3] - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (3) सोए सोए गाओ सहज लाडिली लाल। करै लड़िली-लाल सो, हम तुरंत गाते हैं.. [1] हम तुरंत गाते हैं, सुत दुहुं दिसि कोउ ऐसी। बुध जन लेहु बिचारि, कमल दिनकर कोउ साहू।।[2] लीला ललित बिहार, श्यामा श्यामा मन भवाई। भगवतरसिका अन्ननि, उपासका अनुदिन गवई.. [3] - श्री भागवत रसिका, भागवत रसिका की वाणी, निर्विरोध मनोरंजन (3)
जोगी ज्ञानी कर्मठीजगत में पैसन ही की माँड