जगत में पैसन ही की माँड
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 3 of 135
(राग सारंग)
जगत में पैसन ही की माँड।
पैसन बिना गुरू को चेला, खसमै छांड़ै राँड़॥ [1]
जप, तप, जोग, बिराग, ज्ञान कौं पैसन राखी चाँड़।
धीरज, धर्म, बिबेक, सौचता दई पंडितन छाँड़॥ [2]
संत, महंत, गाँव के आमिल करत प्रजा कौ डाँड़।
भगवतरसिक संग बिन सबकी, कीन्हीं कलियुग भाँड़॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (3)
(राग सारंगा) इस दुनिया में पैसे का एकमात्र स्रोत। गुरु शिष्य बिनु धन, खसमै छंदै रांदा। [1] जप, तप, जोग, बिराग, ज्ञान कौन पैसा राखि चंदा। धीरज, धरम, बिबेक, सोचता दाई पंडित छंदा.. [2] संत, महंत और गणव में शामिल होने वाले लोगों को कौन चिपका सकता है। भगवत रसिक संग बिन सबकी, किनहिं कलियुग भांडा.. [3] - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, अन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्द्ध] (3)