चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 23 of 135
यह दिव्य प्रसाद प्रिया पिय कौ।
रदसत ही मन मोद बढावत, परसत पाप हरत हिय कौ॥
पावत परम प्रेमम उपजावत, भुलवत भाव पुरुष तिय कौ।
भगवतरसिक भाँवत भूषन, तिहि छिन होत जुगल जिय कौ॥
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (7)
हाँ, दिव्य प्रसाद कौन पिए प्रिये? रदासत हि मन मोद बधावत, परसत पाप हरत हि कोउ.. पवत परम प्रेमम उपजवत, भुलावत भव पुरुष ति कोउ। भगवत्रसिक भंवत भूषण, तिहि छिन होता जुगल जिया कोउ.. - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चातम ग्रंथ - स्वर्गीय (7)