नहिं निर्गुन सर्गुन नहीं

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 22 of 135

गौर स्याम मंजुल मृदुल, अद्भुत की कांति। अधर सुधारस बारुनि, पियत लहैं सुख सांति॥ - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (7) गौर स्याम मंजुल शीतल अद्भुत उज्जवल। अधर सुधरस बरुनी, पियत लहैं सुख संति.. - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (7)
नवरस नित्य बिहार में नागर जानत नित्तचस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि