ग्राम-सिंह भूंस्यौ बिपिन

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 36 of 135

जीभ जुगल नामहिं जपै, दृगन बिलोकै रूप। उदर भरै अलिवृत्ति सौं, छाँड़ि स्वान, मृग - भूप॥ - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (16) जिभ जुगल नामहिं जपै, द्रिगन बिलोकाई रूप। उदार भई अलीवृत्ति सौं, चंडी हंस, मृग-भूप.. - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक की वाणी, अन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्द्ध] (16)
दोऊ कानन लगि कहैं चुंबन देहिं अँकोरसमन