माया कौं सब जग भजै
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 38 of 135
अनहोनी नहिं होइ कछु, होनी मिटै न कोय।
देखौ सीता दसरथै, अति समर्थ तहँ दोय॥ [1]
अति समर्थ तहँ दोय, राम भर्ता, वसिष्ठ गुरु।
यदुवंसिन को नास भयौ देखत परमेसुरु॥ [2]
पारीछत उर ब्याल मृतक पहिरायौ मौनी।
भगवत इच्छा जानि, नहीं यामैं अनहोनी॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (18)
कछुए के साथ कोई अप्रिय घटना नहीं घटी है, उसे किसी ने नष्ट नहीं किया है. देखो सीता दशरथाय, अति समर्थ तन दोय.. [1] अति समर्थ तन दोय, राम भरत, वशिष्ठ गुरु। परमेसुरु भय से यदुवंशिन को देखता है। [2] पारीछत उर ब्याल मृतक पहिरयौ मौनी। भगवत इच्छा जानी, नहिं यमन अनहोनि.. [3] - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, अन्य निश्चित ग्रंथ [बाद में] (18)