कोउ सुकिया कोउ परकिया
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 39 of 135
जो कछु लिख्यौ ललाट में, दुख सुख देही संग।
भुगतैगौ जहँ जाइगौ, यह सिद्धांत अभंग॥ [1]
यह सिद्धांत अभंग, तजत क्यों धीरज प्रानी।
वृन्दावन परिहरे, प्रिया प्रीतम रजधानी॥ [2]
भगवत नित्यबिहार, स्याम स्यामाँ को गैलछु।
भूख प्यास सहि रहे, आनि बीते सिर जो कछु॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (18)
तुम कुछ भी लिखो प्यारे आदमी, दुःख और सुख तो शरीर के साथ हैं। जहाँ जागोगे वहीं भोगोगे, नहीं तो सिद्धांत टूट जायेगा..[1] यः सिद्धांत अभंग, तजत् क्यों धीरज प्राणि। वृन्दावन परिहारे, प्रिया प्रीतम राजधानी। [2] भागवत नित्य बिहार, स्याम स्यामन को गेलच्छु। भूखा-प्यासा स्वस्थ रहता है और कछुआ जिसका सिर काट देता है, वह स्वस्थ रहता है.. [3] - श्री भागवत रसिक, श्री भागवत रसिक का भाषण, निर्विरोध मनोरंजन (18)