माया कौं सब जग भजै

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 50 of 135

(कुंडलियाँ) पैसा पापी साधु कौं, परसि लगावै पाप। बिमुख करै गुरु इश्ट तै, उपजावै संताप॥ [1] उपजावै संताप, ज्ञान बैराग्य बिगारै। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर सिंगारै॥ [2] सब द्रोहिन में सिरै, भक्त द्रोही नहिं ऐसा। भगवतरसिक अनन्य, भूल जिन परसी पैसा॥ [3] - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (23) (राशिफल) कौन धन का लालची संत है, जो दूसरों के समान ही पाप करता है? बिमुख करै गुरु इष्ट तै, उपजवै स्नैप.. [1] उपजवै स्नैप, ज्ञान बैराग्य बिगराय। काम, क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह, वासना... [2] सब मन के धोखेबाज हैं, भक्त ऐसा नहीं होता। भगवतरसिका अन्य, भुल जिन परसी पैसा.. [3] - श्री भगवत रसिका, श्री भगवत रसिका की वाणी, अन्य निश्चित ग्रंथ [बाद में] (23)
ग्राम-सिंह भूंस्यौ बिपिनकोउ सुकिया कोउ परकिया