कोउ सुकिया कोउ परकिया
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 51 of 135
आसा जाकी जहँ बसी, तहँ ताही कौ बास।
गेही होय विरक्त कै, कै स्वामी कै दास॥ [1]
कै स्वामी कै दास, महातम सब कहिबे कौं।
भगवत रसिक अनन्य बचन जुग जुग गहिबे कौं॥ [2]
तजै निवृतित्त प्रवृत्ति, रहैं नित तिनके पासा।
नित्य बिहार अखंड, मिलन की जिनकों आसा॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (24)
जहां आसा जाकी रहती है, वहां कोई नहीं रहता. गेहूं यज्ञ है, हर स्वामी का सेवक... [1] हर स्वामी का सेवक, सबसे बड़ा कौन कह सकता है? भगवत रसिक अन्य बचन जुग जुग गहिबे कौन.. [2] तजै निवृत्तित्त प्रवृत्ति, रहैं नित तिनके पासा। नित्य बिहार अखंड है, जो मिलन की आशा करता है.. [3] - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनोरंजन (24)