भानुनन्दिनी मो तन हेरो

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 62 of 135

(राग ईमन व कल्याण) जै जै रसिक रवनी रवन। रूप गुन लवन्य प्रभुता प्रेम पूरन भवन॥ विपति जन की भानबे कौं तुम बिन कहु कवन। हरहु मन की मलिनता, व्यापै न माया पवन॥ विषय रस इन्द्रिय - अजीरन अति, करावहु बवन व। खोलिये हिय के नयन दरसै सुखद बन अवन॥ चतुर चिंतामनि, दयानिधि, दुसह दारिद दवन। मेटिये भगवत ब्यथा, हँसि, भेंटिये तजि मवन॥ - श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (35) (राग ईमान वे कल्याण) जय जय रसिक रवानी रावण। सुन्दरता, लावण्य, प्रभुत्व, प्रेम, सुन्दर इमारत। उन लोगों का मार्गदर्शक कौन है जो आपके बिना दुखी हैं? हरहु मन की मालती, व्यापै न माया पवन.. विषय रस इंद्रिय - अजीरन अति, करवाहु बावन वी. आंखें खोलो और बनो सुखद अवन.. चतुर चिंतामणि, दयानिधि, दुसह दारिद दावान. मेटिये भगवत ब्यथा, हांसी, भेंट्ये तजि मावन.. - श्री भागवत रसिक - भागवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चतम पुस्तक - पूर्वार्ध (35)
नमो नमो श्री बृंदावनचंदजै जै रसिक रवनी रवन। रूप गुन लवन्य प्रभुता प्रेम पूरन भवन॥