नमो नमो श्री बृंदावनचंद

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 61 of 135

(राग गौर) नमो नमो श्री बृंदावनचंद। नित्य अनंत अनादि एकरस पिय प्यारी बिहरत स्वच्छंद॥ [1] सत्त चित्त आनंद रूपमय खग, द्रुम, बेली बृंद। भगवतरसिक निरंतर सेबत मधुप भये पीवत मकरंद॥ [2] - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (34) (राग गौरा) नमो नमो श्री बृंदावनचंद। नित पियें अन्न, शाश्वत एकरसता, प्यारा बिहार, स्वच्छ निर्मल। [1] सत्ता चित्त आनंद रूपमय खग, ढोल, बेली बृंद। भागवतरासिक निरंतर शहद और अमृत का सेवन करते हैं। [2] - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चातम ग्रंथ - पूर्वार्ध (34)
चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहिभानुनन्दिनी मो तन हेरो