माया कौं सब जग भजै

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 64 of 135

कुंजन तै उठी प्राप्त, गात जमुना मै धोवै। निधिवन करि दंडौत, बिहारी को मुख जोवै॥ [1] करै भावना बैठि, सच्छ थल रहित उपाधा। घर घर लेइ प्रसार, लगै जब भोजन स्वाधा॥ [2] संग करै भगवत रसिक, कर करुवा, गूदर गरै। वृन्दावन बिहरत फिरै, जुगल रूप नैननि भरै॥ [3] - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक जी की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (37) जब कुंजन उठी तो मेरी माँ यमुना ने मुझे नहलाया। निधिवन दण्डौत करो, बिहारी को मुख दो। [1] तृप्त भाव, सच्चा भूमिहीन उध्दा। जब भोजन तैयार हो जाए तो उसे घर-घर फैलाएं.. [2] संग कारी भगवत रसिक, कर करुवा, गुदार गराई। [37]
जै जै रसिक रवनी रवन। रूप गुन लवन्य प्रभुता प्रेम पूरन भवन॥प्रथम दरस गोविंद रूप के प्रानपियारे