प्रथम दरस गोविंद रूप के प्रानपियारे

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 65 of 135

प्रथम दरस गोविंद रूप के प्रानपियारे। दूजे मोहनमदन, सनातन सुचि उर धारे॥ तीजे गोपीनाथ, मधू हँसी कंठ लगाये। चौथे राधारमन, भट्ट गोपाल लड़ाये॥ पाँचे हित हरिवंश, सु बल्लभ बल्लभ राधा। छठवें जुगल किशोर, ब्यास सुख दियौ अगाधा॥ सतयै श्री हरिदास के, कुंजबिहारी हैं तहाँ। भगवतरसिक अनन्य मिलि, बास करहु निधिवन जहाँ॥ - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (38) प्रथम दरस, गोविंद रूप के प्यारे। दूसरे मोहन मदन, सनातन सुचि उर धरे.. तीसरे गोपीनाथ, मधु जोर से हंसे. चतुर्थ राधारमण, भट्ट गोपाल लड़ाये.. पांच हित हरिवंश, सु बल्लभ बल्लभ राधा. छठा है जुगल किशोर, ब्यास सुख दियौ अगधा...श्री हरिदास के सत्याय, कुंजबिहारी। भगवतारसिक अन्य मिलि, बस करहु निधिवन जहां.. - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चतम ग्रंथ - स्वर्गीय (38)
माया कौं सब जग भजैचस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि